काया कुंज, निकुंज मन, नैन द्वार अभिराम।
भगवत हृदय सरोज सुख, बिलसत स्यामाँ स्याम॥
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (11)
भगवतरसिकजी कहते हैं कि रसिक की काया ही कुंज-वन है, उसका मन ही निकुंज-महल, उसके नयन ही इस निकुंज-महल के मनोरम झरोखे अथवा द्वार हैं, और उसका हृदय ही वह कोमल कमलों की सेज है, जिस पर श्री श्यामा-श्याम सदा नित्यबिहार का सुख विलसते रहते हैं।
भगवत हृदय सरोज सुख, बिलसत स्यामाँ स्याम॥
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (11)
भगवतरसिकजी कहते हैं कि रसिक की काया ही कुंज-वन है, उसका मन ही निकुंज-महल, उसके नयन ही इस निकुंज-महल के मनोरम झरोखे अथवा द्वार हैं, और उसका हृदय ही वह कोमल कमलों की सेज है, जिस पर श्री श्यामा-श्याम सदा नित्यबिहार का सुख विलसते रहते हैं।

