लै कर बीरी पिय प्रिया, वदन मनोहर देत- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (44)

लै कर बीरी पिय प्रिया, वदन मनोहर देत- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (44)

(दोहा)
लै कर बीरी पिय प्रिया, वदन मनोहर देत ।
लेत नाहिं जब लाडिली, बिनै करत सुख हेत॥


(पद) [इकताल, राग सारंग]
प्यारी जू कौं बीरी षवावत मोहना।
सुन्दर मुष सुष देख्यौ चाहत, नंदनंदन पिय सोहना ।।  [1]
जदपि न लेत लड़ैती कर तें, विनै करत परि गोहना ।
श्रीभट निपट दीन तन देख्यौ, मुसकि दियौ मुष टोहना ।। [2]

- श्री भट्ट देवाचार्य - युगल शतक (44)

(दोहा)
श्रीप्रिया-प्रियतम को आचमन करवाकर सखियाँ सुवासित पान की बीरी अर्पित करती हैं। श्रीलालजी अपने कर-कमल से प्रियाजी को बीरी खिलाना चाहते हैं। प्रियाजी आनाकानी करती हैं। श्रीलालजी रस-वर्धन हेतु उनसे करबद्ध प्रार्थना करते हैं।

प्रेममूर्ति श्री युगलवर को इस प्रेम-क्रीड़ा को निरख कर प्रेमी हृदय श्री भट्टजी कहते हैं:

(पद)
मनमोहन श्रीकृष्ण प्राणप्रिया श्री किशोरीजी को अपने हाथ से ताम्बूल खिलाना चाहते हैं और इसी बहाने नन्दनन्दन श्री लाडिली जी के सुन्दर मुख की शोभा के दर्शन का सुख पाना चाहते हैं। [1] 

श्रीश्यामसुन्दर के द्वारा ऐसा किए जाने पर यद्यपि श्रीप्रियाजी उनके हाथ से बीरी ग्रहण करने में सकुचाती हैं, तथापि श्रीलालजी उनके चरणारविन्दों में अवनत हो मनुहार करते हैं । येनकेन प्रकारेण उन्हें ताम्बूल (बीरी) निज करकमल से खिलाना चाहते हैं। श्रीभट्टजी कहते हैं - जब लालजी श्रीप्रियाजी को बीरी खिलाने में सफल न हो सके, तब अत्यन्त उदास हो गये। अपने प्राणप्रियतम की इस निपट दीन-मुद्रा को देख श्रीप्रियाजी उनकी ओर मन्द मुसकान की छटा बिखेर देती हैं; फलस्वरूप मोहन आनन्दपूर्वक उन्हें बीरी खिलाने में सफल हो जाते हैं। बीरी खिलाने पर वे अपलक श्रीप्रियाजी की सुख-छवि को इस प्रकार निरखने लग जाते हैं मानो प्रियाजी ने उनके ऊपर कोई जादू-टोना कर दिया हो । [2]