भजन-महल में निकसत नाहिंन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (35)

भजन-महल में निकसत नाहिंन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (35)

भजन-महल में निकसत नाहिंन, हरि-पद प्रीति रही उर लागि। 
कामरु क्रोध, लोभ मद मत्सर, ये सब गये रसातल भागि।। [1]
इक छत राज न भय काहू कौ, नित आनंद रह्यौ उर छाइ। 
अर्थ कामना और वासना ये सब मन ते गये नसाइ। ॥ [2]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (35)

भागवत धर्म की श्रेष्ठता यह है कि भगवान् का भजन करने वाला भक्त भजन रूपी महल में ही रहता है उसे वहाँ से निकलने की न इच्छा होती है और न ही उसे अवकाश है। उसके हृदय में तो श्री हरि-चरणों की अचल प्रीति निवास करती है। ऐसे भजनानन्दी भक्त के हृदय से काम, क्रोध, लोभ, मद और मत्सर निकल कर न जाने कहाँ रसातल में पलायन कर जाते हैं, सामने आने का साहस नहीं कर पाते हैं। [1] 

ऐसे वैष्णव भक्त का ही सब ओर एकछत्र राज्य हो जाता है और उसके हदय में निरन्तर भक्ति-जन्य आनन्द छाया रहता है। उस आनन्द के समक्ष धन-मान सम्बन्धी समस्त कामनाएँ और वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं। [2]