(राग कान्हरौ)
राधे दुलारी मान तजि।
प्रान पायौ जात है री मेरौ सजि॥ [1]
अपनौं हाथ मेरे माथे धरि अभै दान दै अजि।
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम कहत री प्यारी
रंग रुचि सौं बलि लजि॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (22)
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं: हे दुलारी राधे, आप मान तज प्रसन्न हों। आपकी चढ़ी हुई चितवन मुझे अत्यंत भयभीत कर रही है। आपकी प्रसन्नता में मेरे प्राण बसते हैं । [1]
आप कृपा करके अपने कर कमल मेरे मस्तक पर रखिये, एवं मुझे अभय दान दीजिए । श्री हरिदास जी के स्वामी श्याम स्वामिनी श्यामा जू से कह रहे हैं - आपके हृदय में भी तो कलि की भावना है। आपकी रुचि रूपी रंग जैसी आपकी वैसी ही हमारी है, क्यूँ मान कर रही हैं । श्री बिहारी जी के आग्रह पर उन्होंने रोष त्याग दिया तथा अंग से अंग मिला दोनों विहार में निमग्न हो गये। [2]

