(राग धनाश्री व राग सारंग)
पान खवावत कर कर बीरी।
एकटक है मोहन मुख निरखत पलकन परत अधीरी।। [1]
हसत निहारत वदन श्याम को तनकी सुध बिसरी री।
रसिक प्रीतम के अंग संग मिल छतियाँ भई अति सीरी।। [2]
- श्री हरिराय जी
श्री राधा अपने सुंदर हाथों से श्री श्याम सुंदर को पान खिला रही हैं । वह एकटक मोहन के मुख को निहार रही हैं, एवं वह अधीर हो जाती हैं जब उनकी पलकें लगती हैं । [1]
वह श्री श्याम सुंदर को निहार निहार कर प्रसन्न हो रही हैं, एवं अपनी तन की सुधि भी बिसरा रही हैं। श्री हरिराय जी कहते हैं कि जब श्री राधा रसीक प्रीतम के अंग संग प्रेम आलिंगन करती हैं तब ही उनका विरह शांत होता है। [2]

