छबीलो रसिकराय नवरंग -  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (698)

छबीलो रसिकराय नवरंग - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (698)

(राग बिलावल, इकताला )
छबीलो रसिकराय नवरंग । 
सुंदर बर मुरलीधर प्यारो ब्रजमोहन सब अंग ।। [1]
ब्रज की सोभा मंगलमूरति ग्वालमंडली-संग । 
उनै उनै बरसत आनँदघन दिन अनुराग अभंग ।। [2]
-  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (698)

श्री आनंदघन कह रहे हैं "नित्य नवरंग रसिक शिरोमणि श्री श्यामसुंदर छबीले हैं। सुन्दर हाथों में सुन्दर मुरली धारण किये हुए श्री मनमोहन के समस्त अंग अति सुन्दर हैं।  [1]

श्री ब्रज धाम की शोभा हर ओर से मंगल ही मंगल है, जहाँ श्री श्यामसुंदर अपने ग्वालमंडली संग विचरण कर रहे हैं। श्री आनंदघन कह रहे हैं "श्री श्यामसुंदर की इन लीलाओं के दर्शन से मेरे ऊपर अनुराग की वर्षा उमड़ उमड़ कर हो रही है।"  [2]