राधाकृष्णौ विपुल पुलकावुन्मदोल्लास हासौ दृष्ट्वा दृष्ट्वा मधुर मधुर गायतो यस्य नाम।
आदौ श्रीयुज्ज्ययुतमिदं हादि वृन्दावनेति तस्मिन् येषां वलित रसना तैः किमप्राप्यमस्ति।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (13.18)
विपुल पुलकावलि युक्त होकर उन्मद-उल्लास-हास्य परायण श्रीराधा-कृष्ण जिसका दर्शन करके मधुर-मधुर स्वर से ‘श्री’ युक्त (श्रीवृन्दावन) ‘जय’ युक्त (जय वृन्दावन) एवं ‘हा’ युक्त (हा-वृन्दावन) इस प्रकार जिस श्रीवृन्दावन का नाम गान करते हैं, उसके नाम को जिन पुरुषों की रसना निरन्तर रटती है, भला उनके लिये क्या अप्राप्य है?
आदौ श्रीयुज्ज्ययुतमिदं हादि वृन्दावनेति तस्मिन् येषां वलित रसना तैः किमप्राप्यमस्ति।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (13.18)
विपुल पुलकावलि युक्त होकर उन्मद-उल्लास-हास्य परायण श्रीराधा-कृष्ण जिसका दर्शन करके मधुर-मधुर स्वर से ‘श्री’ युक्त (श्रीवृन्दावन) ‘जय’ युक्त (जय वृन्दावन) एवं ‘हा’ युक्त (हा-वृन्दावन) इस प्रकार जिस श्रीवृन्दावन का नाम गान करते हैं, उसके नाम को जिन पुरुषों की रसना निरन्तर रटती है, भला उनके लिये क्या अप्राप्य है?

