दोउ मगन भये रस होरी - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी

दोउ मगन भये रस होरी - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी

दोउ मगन भये रस होरी में,
दै गलबैयाँ लाल लड़ैती, बँधे प्रेम की डोरी में ॥ [1]
मृदु मुसकावत चित्त चुरावत ले गुलाल कर झोरी में । 
रूप माधुरी रंग बढ्यो है कुँवर किसोर किसोरी में ॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी

श्रीप्रियालाल होरी के आनन्द में मगन हो रहे हैं। प्रेम की डोरी में बँधे दोनों परस्पर गलबहियाँ डाले मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं और एक-दूसरे के चित्त को चुरा रहे हैं । [1]

दोनों ने एक-दूसरे पर डालने के लिए गुलाल निकाल कर हाथों में ले रखा है ।आनन्दोल्लास के इन क्षणों में युगल किशोर की रूप -माधुरी का रंग रस वर्धन क्षण क्षण हो रहा है । [2]