भक्त बनता हूँ मगर अधमों का सिरताज भी - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी

भक्त बनता हूँ मगर अधमों का सिरताज भी - श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी

भक्त बनता हूँ मगर अधमों का सिरताज भी।
देखकर पाखंड मेरा हंस पड़े ब्रजराज भी ।। [1]
कौन मुझसे बढकर पापी होगा इस संसार में।
सुन के पापों की कहानी डर गये यमराज भी ।। [2]
क्यूं पतित उनसे कहे सरकार तुम तारो हमें।
हैं पतितपावन तो रक्खेंगे अपनी लाज भी ।। [3]
‘बिन्दु” दृग के दिल हिलादें क्यों न दीनानाथ का।
दर्द दिल भी साथ है औ’ दुखभरी आवाज भी ।। [4]
- श्री बिंदु जी, मोहन मोहिनी

मैं स्वयं को भक्त मानता हूँ, परन्तु वास्तव में पापियों का मुकुट मणि हूँ। ब्रज के भगवान श्री कृष्ण भी मेरे पाखंड पर हंसते हैं। [1]

इस समस्त संसार में मुझसे बड़ा पापी कौन हो सकता है? मेरे पापों से यमराज भी डर जाते हैं! [2]

पतित आत्मा को प्रभु की कृपा क्यों मांगनी चाहिए? यदि प्रभु 'पतित पावन' [अकारण दयालु, पापियों के जीवन को शुद्ध करने वाले] हैं, तो भगवान स्वतः ही अपने नाम की लाज रखेंगे। [3]

प्रेम के आँसु दीनों के नाथ भगवान कृष्ण के ह्रदय को क्यों नहीं हिला सकते? श्री बिंदु जी महाराज कहते हैं, मेरे पास एक दुःख भरा ह्रदय भी है और दुखी आवाज भी है। [4]