सकुचत कहत कहावत दासी ।
कहँ मैं अधम नीच अति पामर, कहँ तुम नवल निकुंज निवासी ।। [1]
निज कारण देखौं जग माही, नित सब करत रावरी हाँसी ।
याही सोच जरत निज छाती, व्यापी रहत हृदय चिंता सी ।। [2]
भूषण भार असन विष लागत, सुखद सेज जनु जरत चिता सी ।
'भोरी' दुःख सब हरहु कृपानिधि, करि पद कंज अनन्य उपासी ।। [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (49)
हे श्री राधे ! मुझे स्वयं को आपकी दासी कहने तथा दूसरो के द्वारा स्वयं को आपकी दासी कहकर बुलाये जाने में अत्यधिक संकोच का अनुभव होता है ; क्योकि कहाँ तो आप श्री वृन्दावन की नित्य नवल कुंजो एवं निभृत निकुंजों में निवास करने वाली और कहाँ मैं बहुत बड़ी दुराचारिणी, बहुत बड़ी दुष्टा एवं अत्यंत निम्न कोटि की । [1]
मैं तो अपने इछाओ की पूर्ति में लगी हुई, संसार में भटकती फिर रही हूँ; किन्तु सभी लोग मुझ पर ताने मारते हुए, आपकी हँसी उड़ा रहे है । इसी सोच-विचार में मेरी छाती जली जा रही है और मेरा हृदय इसी चिंता से ग्रस्त है । [2]
मुझे वस्त्र-आभूषण भार स्वरुप लगने लगते है ,भोजन विष तुल्य लगता है और सुखद शैया ऐसी प्रतीत होती है, जैसे कोई चिता जल रही हो । श्रीहित भोरी सखी जी निवेदन करती है कि हे परम कृपालु मेरी स्वामिनी ! मेरे समस्त कष्टों का निवारण कर, मुझे अपने चरण-कमलो की अनन्य उपासिका बनाने की कृपा करो । [3]
कहँ मैं अधम नीच अति पामर, कहँ तुम नवल निकुंज निवासी ।। [1]
निज कारण देखौं जग माही, नित सब करत रावरी हाँसी ।
याही सोच जरत निज छाती, व्यापी रहत हृदय चिंता सी ।। [2]
भूषण भार असन विष लागत, सुखद सेज जनु जरत चिता सी ।
'भोरी' दुःख सब हरहु कृपानिधि, करि पद कंज अनन्य उपासी ।। [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (49)
हे श्री राधे ! मुझे स्वयं को आपकी दासी कहने तथा दूसरो के द्वारा स्वयं को आपकी दासी कहकर बुलाये जाने में अत्यधिक संकोच का अनुभव होता है ; क्योकि कहाँ तो आप श्री वृन्दावन की नित्य नवल कुंजो एवं निभृत निकुंजों में निवास करने वाली और कहाँ मैं बहुत बड़ी दुराचारिणी, बहुत बड़ी दुष्टा एवं अत्यंत निम्न कोटि की । [1]
मैं तो अपने इछाओ की पूर्ति में लगी हुई, संसार में भटकती फिर रही हूँ; किन्तु सभी लोग मुझ पर ताने मारते हुए, आपकी हँसी उड़ा रहे है । इसी सोच-विचार में मेरी छाती जली जा रही है और मेरा हृदय इसी चिंता से ग्रस्त है । [2]
मुझे वस्त्र-आभूषण भार स्वरुप लगने लगते है ,भोजन विष तुल्य लगता है और सुखद शैया ऐसी प्रतीत होती है, जैसे कोई चिता जल रही हो । श्रीहित भोरी सखी जी निवेदन करती है कि हे परम कृपालु मेरी स्वामिनी ! मेरे समस्त कष्टों का निवारण कर, मुझे अपने चरण-कमलो की अनन्य उपासिका बनाने की कृपा करो । [3]

