मुसिक्यात जात सखी कहत बात - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, शृंगार रस के पद (7)

मुसिक्यात जात सखी कहत बात - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, शृंगार रस के पद (7)

(राग श्याम कली)
मुसिक्यात जात सखी कहत बात ।
प्रेम मुदित ह्वै उदित प्रियाप्रिय पुलकि पुलकि लपटात गात ।। [1]
अनंग रंग रस रूप अनुपम फूले अंग अंग न समात ।
नागरिदासि दंपति दुलरावति निरखि निरखि नैन न अघात ।। [2]

- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, शृंगार रस के पद (7)

अरी सखी, आज प्रियालात परस्पर प्रेम-लपेटी अटपटी बातें करते हुए मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे हैं । प्रेमातिरेक से प्रमुदित यह दोनों आनंद की तरंगों में तैर रहे हैं और उमग-उमग कर एक दूसरे को अंकों भर रहे हैं। [1]

अनंगोल्लास के कारण दोनों का अनुपम लावण्य से अभिमंडित रूप पहले से भी अधिक चित्ताकर्षक हो उठा है। इनके प्रफुल्लित अंगों से आनंद का ज्वार उमड़ रहा है। श्री नागरीदासी ऐसे रसमय युगल को अपने हृदय के संपूर्ण प्यार से सदा दुलराया करती हैं और इनके अद्भुत रूप-लावण्य को निरंतर निरख-निरख कर भी उनके नेत्र कभी तृप्त नही होते । [2]