मो मन मानिक लै गयो, चितै चोर नंदनंद।
अब बेमन मैं क्या करुं, परी फेर के फंद॥
- श्री रसखान
नन्द के लाडले (श्री कृष्ण) ने अपनी चितवन मात्र से मेरे मन रूपी अनमोल माणिक्य को चुरा लिया है। अब मैं बिना मन के क्या करूँ? मैं तो उनके प्रेम के इस विचित्र भँवर और फँदे में फँस गई हूँ, जहाँ से निकलना अब असंभव है।
अब बेमन मैं क्या करुं, परी फेर के फंद॥
- श्री रसखान
नन्द के लाडले (श्री कृष्ण) ने अपनी चितवन मात्र से मेरे मन रूपी अनमोल माणिक्य को चुरा लिया है। अब मैं बिना मन के क्या करूँ? मैं तो उनके प्रेम के इस विचित्र भँवर और फँदे में फँस गई हूँ, जहाँ से निकलना अब असंभव है।

