(राग कान्हरौ)
हरिजन संग छिनक जो होई।
कोटि स्वर्गसुख कोटि मुक्ति सुख, तासम लहे न कोई॥ [1]
पूरै भाग्य पुन्य सञ्चित फल, कृष्ण कृपा है जाके।
'सूरदास' हरि जन पद महिमा, कहत भागवत ताके॥ [2]
- श्री सूरदास, सूर सागर
यदि एक क्षण को भी हरिजन [संत] का दर्शन हो जाए, तो वह अनमोल है जिससे कोटि स्वर्ग सुख, कोटि मुक्ति सुख इत्यादि की भी तुलना असम्भव है । [1]
ऐसा मानना चाहिए की श्री कृष्ण की अहेतु की कृपा से जब पूर्व जन्मों के सुकृत का उदय होकर फल रूप में मिलता है तभी वास्तविक संत के दर्शन होते हैं । श्री सूरदास जी कहते हैं कि श्रीमद् भगवतम में श्री हरि के भक्त के चरणों की महिमा का गुणगान किया है । [2]

