कब इन नैंनन ते लखुं, वृंदावन की धूरी।
जो रसिकन की परम धन, पावन जीवन मूरी॥
- ब्रज के दोहे
कब मैं इन नयनों से श्री वृंदावन की उस परम-पावन रज का दर्शन करूँगा, जो रसिकों का प्राण-धन एवं जीवन का आधार है।
जो रसिकन की परम धन, पावन जीवन मूरी॥
- ब्रज के दोहे
कब मैं इन नयनों से श्री वृंदावन की उस परम-पावन रज का दर्शन करूँगा, जो रसिकों का प्राण-धन एवं जीवन का आधार है।

