कुँवरिकिसोरी नागरी, मोहि दीजै निज हार - श्री भट्ट देवाचार्य - युगल शतक (73)

कुँवरिकिसोरी नागरी, मोहि दीजै निज हार - श्री भट्ट देवाचार्य - युगल शतक (73)

(दोहा)
कुँवरिकिसोरी नागरी, मोहि दीजै निज हार ।
तुम करि औरै लीजियै, बहु फूली फुलवार॥


(पद)- (इकताल, राग-विहागरो)
बहु फूली फुलवारि ये दीजै निज हार ।
उरझयौ मोतिन माल में, हौं लेऊँ सुरझार ॥
कुँवरि किशोरी नागरी, सखी और सॅवार ।
श्रीभट निपट लटू लष्यौ , कहि लेहु उतार ॥

- श्री भट्ट देवाचार्य - युगल शतक (73)

(दोहा)
श्रीकृष्ण श्रीराधा से कहते हैं: हे कुँवरी किशोरी नागरीजू! मुझे अपना निज हार [पहना हुआ हार] प्रसाद-रूप में दे दीजिए। इस फूलों की फुलवारी में से एक सखी आपको कोई अन्य हार दे देगी, आप वह ले लीजिए।

(पद)
श्रीप्रियाजी के अंग-स्पर्श की उत्कंठा बढ़ने पर श्रीलालजी कहते हैं- हे कुँवरी किशोरी ! यह जो अपना हार है, सो कृपा कर मुझे दे दीजिए । फुलवारी विविध प्रकार से फूल रही है, यह सखी दूसरा हार संवार कर आपको धारण करा देगी, अतः इसे मुझे उतार लेने दीजिए। कदाचित् आप यह कहें कि हार तो मोतियों की माला में उलझ गया है, तो हे किशोरीजी ! (आप इसकी चिन्ता न कीजिए) मैं बड़ी ही सावधानीपूर्वक सुलझा कर उतार लूगा । श्रीभट्टजी कहते हैं-इस प्रकार श्रीश्यामसुन्दर को तन-मन से अपने आधीन देख श्रीप्रियाजी हार उतारने के लिए कह देती हैं | (श्रीलालजी हार उतार अपने कंठ में धारण कर आनन्द से भर उठते हैं) ॥