मेरे तो गिरिधर ही गुणगान - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1089)

मेरे तो गिरिधर ही गुणगान - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1089)

(राग कल्याण)
मेरे तो गिरिधर ही गुणगान।
यह मूरत खेलत नयनन में , यही हृदय में ध्यान ॥ [1]
चरण रेणु चाहत मन मेरो, यही दीजिये दान ॥
‘कृष्णदास’ कौ जीवन गिरिधर मंगल रूप निधान ॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1089)

मेरा संबंध एकमात्र श्री गिरिधर के गुणगान करने से ही है । गिरिधर की ही मूर्ति नैनों में बसी है, और हृदय में गिरिधर का ही ध्यान बसा हुआ है । [1]
 
मेरा मन को केवल श्री कृष्ण की चरण रेणु प्राप्त करने की ही लालसा है, यही मुझे दान रूप में दीजिए । श्री कृष्ण दास कहते हैं कि मेरा जीवन श्री गिरिधर लाल ही है जो मंगल रूप निधान हैं ।[2]