प्रेम पगे जु रँगे रँग साँवरे, माने मनाये न लालची नैना ।
धावत है उत ही जित मोहन रोके रुकै नहिं घूघट ऐना ॥ [1]
कानन को कल नाहिं परै बिन प्रीति में भीजे सुने मृदु बैना ।
‘रसखान’ भई मधु की मखियाँ अब नेह को बंधन क्यों हूँ छुटेना ॥ [2]
- श्री रसखान
श्री रसखान कहते हैं साँवरे कृष्ण के प्रेम से रंगी मेरी आंखें उनके रूप के लिए लालची सी बनी हैं। वे कृष्ण की खोज में वहाँ ही जाती हैं जहाँ मोहन है, चाहे घूँघट डाल दो, परंतु अब यह किसी के भी रोके नहीं रुकेगी । [1]
जब तक कान श्री कृष्ण की मधुर बोली नहीं सुनते, तब तक मेरे कान अधीर ही रहते हैं। श्री रसखान कहते हैं कि जैसे मधुमखि मधु के लिए बाँवरी हैं, वैसे ही मैं भी श्री कृष्ण के नेह में बाँवरी हूँ । [2]
धावत है उत ही जित मोहन रोके रुकै नहिं घूघट ऐना ॥ [1]
कानन को कल नाहिं परै बिन प्रीति में भीजे सुने मृदु बैना ।
‘रसखान’ भई मधु की मखियाँ अब नेह को बंधन क्यों हूँ छुटेना ॥ [2]
- श्री रसखान
श्री रसखान कहते हैं साँवरे कृष्ण के प्रेम से रंगी मेरी आंखें उनके रूप के लिए लालची सी बनी हैं। वे कृष्ण की खोज में वहाँ ही जाती हैं जहाँ मोहन है, चाहे घूँघट डाल दो, परंतु अब यह किसी के भी रोके नहीं रुकेगी । [1]
जब तक कान श्री कृष्ण की मधुर बोली नहीं सुनते, तब तक मेरे कान अधीर ही रहते हैं। श्री रसखान कहते हैं कि जैसे मधुमखि मधु के लिए बाँवरी हैं, वैसे ही मैं भी श्री कृष्ण के नेह में बाँवरी हूँ । [2]

