(राग कान्हरौ)
सुधंग नाचत नवल किसोरी ।
सुधंग नाचत नवल किसोरी ।
थेई थेई कहति चहति प्रीतम दिसि, वदन चंद मनौं त्रिषित चकोरी ।। [1]
तान बंधान मान में नागरि देखत स्याम कहत हो हो होरी ।
(जै श्री) हित हरिवंश माधुरी अँग अँग, बरवस लियौ मोहन चित चोरी ।।[2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (78)
नवल किशोरी राधिका आज सुधंग नृत्य नाच रही है और थेइ थेई कहते हुए अपने प्रियतम के मुख चन्द्र की ओर ऐसे देखती है जैसे ( रूप की ) प्यासी चकोरी । [1]
नृत्य गान की तान और उसके यथा स्थल बन्धान ( ठेका ) सहित नृत्य करने वाली मानमयी चतुरा नागरी श्रीप्रियाजी को देखकर प्रियतम श्याम सुन्दर हो हो होरी कहते ( हुए हर्ष से भर कर उनकी प्रशंसा करते ) हैं । श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि इस प्रकार इस नवल किशोरी ने अपने अंग प्रत्यंगों की ( हाव भाव पूर्ण ) मधुरिमा से प्रियतम श्रीलालजी का मन बरवश ( हठात् ) चुरा लिया है । [2]

