कोमल चित्त सब सौं मिलै - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (88)

कोमल चित्त सब सौं मिलै - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (88)

कोमल चित्त सब सौं मिलै, कबहूँ कठोर न होइ।
निस्प्रेही निर्वैरता, ताकी शत्रु न कोई॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (88)

हृदय अत्यंत कोमलता से युक्त हो और सबसे कोमल चित्त से ही मिलें; व्यवहार में कभी भी कठोरता न लाएँ। जो सब प्रकार की इच्छाओं तथा राग-द्वेष से रहित है, उसका कहीं कोई शत्रु नहीं होता। इसी भाव से वृन्दावन में वास करें।