चरचा करी कैसे जाय ?
बात जानत कछुक हम पै कहत जिय ठहराय ।। [1]
मौन में ही कहनि ताकी सुनत श्रोता नैंन ।
सोब ‘नागर’ लोग बूझत कहि न आवत बैंन ।। [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी
इस रस की चर्चा यदि करी जाए तो किस प्रकार करी जाए? इस रस का तत्व इतना गोपनीय है कि श्रोतीय एवं रस निष्ठ सभी महानुभाव असमर्थ हैं, किसी न किसी कारण से । [1]
इस रस का कथन मौन में ही है, एवं श्रोता जो इस रस को ग्रहण करना चाहता हो उसे रसिक की आँखों से ही रस को सुनना एवं ग्रहण करना चाहिए । श्री नागरीदास कहते हैं कि यदि लोग इस रस को जानने की आकांक्षा भी करते हैं तो वो इस गोपनीय तत्व को बिना श्रोता के अनुभव के किस प्रकार वाणी से बताएँ? [2]
बात जानत कछुक हम पै कहत जिय ठहराय ।। [1]
मौन में ही कहनि ताकी सुनत श्रोता नैंन ।
सोब ‘नागर’ लोग बूझत कहि न आवत बैंन ।। [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी
इस रस की चर्चा यदि करी जाए तो किस प्रकार करी जाए? इस रस का तत्व इतना गोपनीय है कि श्रोतीय एवं रस निष्ठ सभी महानुभाव असमर्थ हैं, किसी न किसी कारण से । [1]
इस रस का कथन मौन में ही है, एवं श्रोता जो इस रस को ग्रहण करना चाहता हो उसे रसिक की आँखों से ही रस को सुनना एवं ग्रहण करना चाहिए । श्री नागरीदास कहते हैं कि यदि लोग इस रस को जानने की आकांक्षा भी करते हैं तो वो इस गोपनीय तत्व को बिना श्रोता के अनुभव के किस प्रकार वाणी से बताएँ? [2]

