वृन्दाटव्यामटनमिह चेत् कोटि तीर्थाटनैः किं पक्ष्यादीनां यदि रुत मिहाकर्णिं तत्तु श्रुतैः किम्?।
वृक्षाद्याख्या प्रकथनरुचै स्तोत्रमन्त्रादिकैः किं दृष्टिर्यत्र क्वचिदिह रता चेदलं ध्यानलक्षैः।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (13.13)
इस श्रीवृन्दावन की परिक्रमा यदि तूने कर ली है, तो कोटि तीर्थ यात्राओं का क्या प्रयोजन? यहाँ के यदि पक्षियों की चहचहाहट तुम्हारे कानों में पड़ गई है तो फिर वेदाभ्यास का क्या फल? यहाँ के वृक्षादिकों का नाम ले लिया है तो फिर और स्तोत्र-मन्त्रादि का पढ़ना आवश्यक नहीं है, यदि इस धाम के किसी स्थल पर भी तुम्हारी दृप्टि पड़ी है तो लक्ष-लक्ष ध्यान करने से क्या लाभ।
वृक्षाद्याख्या प्रकथनरुचै स्तोत्रमन्त्रादिकैः किं दृष्टिर्यत्र क्वचिदिह रता चेदलं ध्यानलक्षैः।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (13.13)
इस श्रीवृन्दावन की परिक्रमा यदि तूने कर ली है, तो कोटि तीर्थ यात्राओं का क्या प्रयोजन? यहाँ के यदि पक्षियों की चहचहाहट तुम्हारे कानों में पड़ गई है तो फिर वेदाभ्यास का क्या फल? यहाँ के वृक्षादिकों का नाम ले लिया है तो फिर और स्तोत्र-मन्त्रादि का पढ़ना आवश्यक नहीं है, यदि इस धाम के किसी स्थल पर भी तुम्हारी दृप्टि पड़ी है तो लक्ष-लक्ष ध्यान करने से क्या लाभ।

