डारो डारो री, रंग बनवारी पै ।
लालहिं लाल गुलाल गाल मलु, मलु अबीर लटकारी पै ।। [1]
रंग बिरंग रंग पिचकारिन, डारो री गिरिधारी पै ।
छोरि लेउ याकी लकुटि कमरिया, लै चलु भानुदुलारी पै ।। [2]
सेहरा बाँधि बनाय दुल्हनियाँ, मिलि नचाउ अलि! तारी पै ।
बलिहारी ‘कृपालु’ ब्रज नारिन, बलिहारी येहि यारी पै ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, होरी माधुरी (6)
होली के अवसर पर एक सखी अन्य समस्त सखियों से कहती है कि चलो चलो सब लोग श्यामसुन्दर के ऊपर रंग डालो । लाल - लाल गुलाल उनके गालों में मल दो एवं अबीर उनके घुँघराले बालों में मल दो । [1]
अनेक रंग के रंग घोल कर पिचकारियों से उन्हें सराबोर कर दो । उनकी लठिया और कामरी छीन लो एवं उन्हें पकड़कर श्री किशोरी जी के पास ले चलो । [2]
पुन: उनके सिर सेहरा बाँधकर नवविवाहिता वधू बनाकर, अपने हाथों की तालियों की ताल पर सब मिलकर नचाओ । ’श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मैं इन ब्रजांगनाओं पर तो बलिहार जाता हूँ परन्तु विशेष रूप से उनके प्रेम पर बलिहार जाता हूँ जिस प्रेम में बँधे हुए ब्रह्म की ऐसी दुर्दशा हो रही है । [3]

