व्यासहि अब जिनि जानियौ, लोक वेद कौ दास।
राधा वल्लभ उर बसे, औरन तें जु उदास॥
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, साखी (13)
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि अब वे लोक-वेद की मर्यादाओं के दास नहीं रहे, क्योंकि श्री राधावल्लभ लाल उनके हृदय में विराजमान हैं; अन्य सब से वे उदासीन हो चुके हैं।
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि अब वे लोक-वेद की मर्यादाओं के दास नहीं रहे, क्योंकि श्री राधावल्लभ लाल उनके हृदय में विराजमान हैं; अन्य सब से वे उदासीन हो चुके हैं।

