कान्हा धारे रे मुकुट खेले होरी - श्री हरिराय जी

कान्हा धारे रे मुकुट खेले होरी - श्री हरिराय जी

(रसिया)
कान्हा धारे रे मुकुट खेले होरी।
इतते आये कुँवर कन्हैया उतते आईं राधा गोरी।।[1]
फेंट गुलाल हाथ पिचकारी मारत हैं भर-भर झोरी।
रसिक गोविन्द अभिराम श्याम धन जुग जुग जीवो यह जोरी।।[2]

- श्री हरिराय जी

श्री श्याम सुंदर सुंदर मुकुट पहने होली का सुंदर खेल खेल रहे हैं । इधर से कुंवर कन्हैया आ रहे हैं और उधर से श्री राधा गोरी आ रही हैं ।[1]

उन्होंने अपनी सुंदर झोली में गुलाल भर रखा है एवं पिचकारी को भर भर के एक दूसरे पर रंग एवं गुलाल डाल रहे हैं ।  श्री हरिराय जी कहते हैं "मेरे जीवन का धन, यह सुंदर दिव्य युगल जोरी जुग जुग जीवे ।" [2]