वन्दे वृन्दावनगतमहं भक्तिभारावनम्रो - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.4)

वन्दे वृन्दावनगतमहं भक्तिभारावनम्रो - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.4)

वन्दे वृन्दावनगतमहं भक्तिभारावनम्रो धन्याग्रण्यं कृमिमपि न चान्यत्र-संस्थान तृणाय।
मन्ये ब्रह्मादिक-सुरगणान् किं बहूक्त्या ममेयं प्रौढिर्गाढ़ा न खलु परतो भाति कृष्णोऽपि पूर्णः।।

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.4)

भक्तिपूर्वक नम्र होकर श्रीवृन्दावन के परमधन्य कीड़े की भी मैं वन्दना करता हूँ, किन्तु अन्यत्र रहने वाले ब्रह्मादिक देवताओं को तृण के समान भी नहीं मानता। और अधिक क्या कहूँ? मेरी यह चतुरतापूर्ण बात पक्की है, क्योंकि श्रीवृन्दावन को छोड़कर श्रीकृष्ण भी तो पूर्णरूप से प्रतिभात नहीं होते।