हा नाथ गोकुलसुधाकर सुप्रसन्न वक्त्रारविन्द मधुरस्मित हे कृपारद् ।
यत्र त्वया विहरते प्रणयैः प्रियाऽऽरा त्तत्रैव मामपि नय प्रियसेवनाय ।।
- श्री रघुनाथ दास, विलाप कुसुमांजलि (100)
हे नाथ ! हे गोकुलचन्द्र ! हे प्रसन्नमुखकमल ! हे मधुर-मन्द मुसकानकारी ! हे कृपाभिषिक्त ! आप जहां अतिशय प्रेमपूर्ण होकर अपनी प्रिया श्रीराधा जी के साथ विहार करते हैं, अपनी प्रियतमा की सेवा के लिये मुझे भी आप वहां ले चलो ।
यत्र त्वया विहरते प्रणयैः प्रियाऽऽरा त्तत्रैव मामपि नय प्रियसेवनाय ।।
- श्री रघुनाथ दास, विलाप कुसुमांजलि (100)
हे नाथ ! हे गोकुलचन्द्र ! हे प्रसन्नमुखकमल ! हे मधुर-मन्द मुसकानकारी ! हे कृपाभिषिक्त ! आप जहां अतिशय प्रेमपूर्ण होकर अपनी प्रिया श्रीराधा जी के साथ विहार करते हैं, अपनी प्रियतमा की सेवा के लिये मुझे भी आप वहां ले चलो ।

