पुण्या बत व्रजभुवो यदयं नृलिङ्ग-गूढ: पुराणपुरुषो वनचित्रमाल्य: ।
गा: पालयन् सहबल: क्वणयंश्च वेणुंविक्रीडयाञ्चति गिरित्ररमार्चिताङ्घ्रि: ॥
- श्रीमद भागवतम् (10.44.13)
सखि! सच पूछो तो, ब्रजभूमि ही परम पवित्र और घन्य है क्योंकि यहाँ यह पुरुषोत्तम मनुष्य के वेष में छिपकर रह रहे हैं। स्वयं देवादिदेव महादेव शंकर और श्री रमादेवी जिनके श्री चरणों की पूजा करती हैं, वे ही प्रभु यहाँ रंग-बिरंगे पुष्पों की माला धारण किये हुए भैया बलराम जी तथा गोपसखाओं के साथ मधुर वंशी बजाते और गऊओं को चराते हुए विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाओं में मग्न होकर आनंद से विहार करते हैं। उनके श्री चरणों के स्पर्श से यह ब्रजभूमि धन्य एवं कृत कृत्य हो रही है।
गा: पालयन् सहबल: क्वणयंश्च वेणुंविक्रीडयाञ्चति गिरित्ररमार्चिताङ्घ्रि: ॥
- श्रीमद भागवतम् (10.44.13)
सखि! सच पूछो तो, ब्रजभूमि ही परम पवित्र और घन्य है क्योंकि यहाँ यह पुरुषोत्तम मनुष्य के वेष में छिपकर रह रहे हैं। स्वयं देवादिदेव महादेव शंकर और श्री रमादेवी जिनके श्री चरणों की पूजा करती हैं, वे ही प्रभु यहाँ रंग-बिरंगे पुष्पों की माला धारण किये हुए भैया बलराम जी तथा गोपसखाओं के साथ मधुर वंशी बजाते और गऊओं को चराते हुए विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाओं में मग्न होकर आनंद से विहार करते हैं। उनके श्री चरणों के स्पर्श से यह ब्रजभूमि धन्य एवं कृत कृत्य हो रही है।

