दूजे तीजे जो जुरै, साक-पत्र कछु आय।
ताही सों संतोष करि, रहै अधिक सुख पाय॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (89)
दूसरे-तीसरे दिन अनायास भाव से जो शाक-पत्रादि प्राप्त हो जाए, उसी में संतोष मानकर निश्चिन्त होकर सुखपूर्वक वृन्दावन में रहे।
ताही सों संतोष करि, रहै अधिक सुख पाय॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (89)
दूसरे-तीसरे दिन अनायास भाव से जो शाक-पत्रादि प्राप्त हो जाए, उसी में संतोष मानकर निश्चिन्त होकर सुखपूर्वक वृन्दावन में रहे।

