प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो - श्री सूरदास, सूर सागर

प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो - श्री सूरदास, सूर सागर

प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो ।
समदर्शी प्रभु नाम तिहारो, चाहो तो पार करो ।। [1]
एक लोहा पूजा मे राखत, एक घर बधिक परो ।
सो दुविधा पारस नहीं देखत, कंचन करत खरो ।। [2]
एक नदिया एक नाल कहावत, मैलो नीर भरो ।
जब मिलिके दोऊ एक बरन भये, सुरसरी नाम परो ।। [3]
एक माया एक ब्रह्म कहावत, सूर श्याम झगरो ।
अबकी बेर मोही पार उतारो, नहि पन जात तरो ।। [4]

- श्री सूरदास, सूर सागर

हे प्रभु, कृपया मेरे दोषों की तरफ़ ध्यान न दें । आप समदर्शी जाने जाते हैं और सभी को समान रूप से प्यार करते हैं, यदि आप चाहें तो मुझे इस भवसागर से पार करें । [1]

एक लोहा है जिसका उपयोग पवित्र पूजा में किया जाता है जबकि एक और है जो एक कसाई इत्यादि ग़लत काम जैसे जानवर काटने इत्यादि में करते हैं । लेकिन प्रभु, क्या पारस यह देखता है कि यह लोहा कौन सा है, वह तो सबको सोना बना देता है । ऐसे ही चाहे मैंने अनंत पाप किए हैं परंतु अब आपकी शरण में हूँ, अब आप मेरे पापों की तरफ़ मत दृष्टि डालें। [2]

एक तरफ नदी है और दूसरी तरफ गंदा नाला है । जब दोनों गंगा जी में मिलते हैं तो दोनों गंगा जी ही कहलाते हैं । गंगा जी दोनों में अंतर नहीं करती बल्कि अपना गुण दोनों को दे देती है । [3]

एक तरफ़ जीव पर माया लगी है, दूसरी ओर जीव [आत्मा] भगवान का ही अंश है, यह झगड़ा सा है । श्री सूरदास जी प्रार्थना करते हैं, हे प्रभु अब बहुत हुआ, अबकि बार मुझे आप इस भवसागर से पार लगा दो, मेरे साधन में तो इतना बल नहीं कि मैं इसे पार कर सकूँ, अब आप अपनी कृपा दृष्टि से ही मेरा काम करिए । [4]