(दोहा)
कबहु क लै निज करनि में, लावत नैन विसाल ।
प्रान प्रिया मन हरनि के, चरन पलोटत लाल ॥
(पद) [ इकताल, राग-बिहागरौ]
प्यारी जू के चरन पलोटत मोहन ।
नील कमल के दलन लपेटे, अरुन कमल दल सोहन ।। [1]
कबहुँक लै लै नैन लगावत, अलि धावत मनु गोहन ।
जै श्रीभट्ट छबीली राधे, होत जगे ते छोहन ॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (76)
(दोहा)
कभी-कभी श्रीकृष्ण प्राणप्रिया श्रीराधा के श्रीचरणों को अपने कर-कमलों में लेकर अत्यंत अनुरागपूर्वक अपने विशाल नेत्रों से लगाते हैं। जो प्रियाजी उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं और उनके चित्त का हरण करने वाली हैं, उन्हें शयन-मुद्रा में विश्राम करते देख श्रीश्यामसुंदर उन्हें अपनी आराध्या स्वामिनी मानकर उनके चरणों की प्रेमपूर्वक पलोटते (दबाते) हैं।
(पद)
श्री प्यारीजी को निद्रावेशित जान श्रीलालजी उनके अति-सुकुमार अरुणिम चरणार विंदों का अपने करकमलों से इस रति से संवाहन करते हैं जिससे किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो तथा निद्रा सुखपूर्वक बनी रहे। उस समय की शोभा ऐसी लगती है मानो अरुण कमल-दल नील-कमल-दल से लिपटे हों। [1]
जब श्रीलालजी के मन में श्री प्रिया जी के चरणारविंदों को अपने हस्तकमल में लेकर नेत्रों से स्पर्श कराने की उत्कंठा जागृत होती है तब वे उन्हें पुनः पुनः ग्रहणकर अपने नेत्रों से लगाते हैं। उस समय की उपमा ऐसी लगती है मानो नेत्र रूपी भ्रमर चरणरूपी कमलों का संग पाने के लिए उनका पीछा कर रहे हों। श्री भट्ट जी जय-जयकार करते हुए कहते हैं जिनके एक-एक रोम कूप में अनन्त छवि समाई हुई है-ऐसी परम छबीली श्रीराधिका प्यारी (नेत्रों का चरणकमल से स्पर्श होने पर) जाग उठती है। श्रीलालजी का अपने प्रति अति स्नेह देख उत्साह से भर उठती हैं और श्री श्याम सुंदर को हृदय से लगा अतिसुख प्रदान करती हैं । [2]
कबहु क लै निज करनि में, लावत नैन विसाल ।
प्रान प्रिया मन हरनि के, चरन पलोटत लाल ॥
(पद) [ इकताल, राग-बिहागरौ]
प्यारी जू के चरन पलोटत मोहन ।
नील कमल के दलन लपेटे, अरुन कमल दल सोहन ।। [1]
कबहुँक लै लै नैन लगावत, अलि धावत मनु गोहन ।
जै श्रीभट्ट छबीली राधे, होत जगे ते छोहन ॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (76)
(दोहा)
कभी-कभी श्रीकृष्ण प्राणप्रिया श्रीराधा के श्रीचरणों को अपने कर-कमलों में लेकर अत्यंत अनुरागपूर्वक अपने विशाल नेत्रों से लगाते हैं। जो प्रियाजी उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं और उनके चित्त का हरण करने वाली हैं, उन्हें शयन-मुद्रा में विश्राम करते देख श्रीश्यामसुंदर उन्हें अपनी आराध्या स्वामिनी मानकर उनके चरणों की प्रेमपूर्वक पलोटते (दबाते) हैं।
(पद)
श्री प्यारीजी को निद्रावेशित जान श्रीलालजी उनके अति-सुकुमार अरुणिम चरणार विंदों का अपने करकमलों से इस रति से संवाहन करते हैं जिससे किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो तथा निद्रा सुखपूर्वक बनी रहे। उस समय की शोभा ऐसी लगती है मानो अरुण कमल-दल नील-कमल-दल से लिपटे हों। [1]
जब श्रीलालजी के मन में श्री प्रिया जी के चरणारविंदों को अपने हस्तकमल में लेकर नेत्रों से स्पर्श कराने की उत्कंठा जागृत होती है तब वे उन्हें पुनः पुनः ग्रहणकर अपने नेत्रों से लगाते हैं। उस समय की उपमा ऐसी लगती है मानो नेत्र रूपी भ्रमर चरणरूपी कमलों का संग पाने के लिए उनका पीछा कर रहे हों। श्री भट्ट जी जय-जयकार करते हुए कहते हैं जिनके एक-एक रोम कूप में अनन्त छवि समाई हुई है-ऐसी परम छबीली श्रीराधिका प्यारी (नेत्रों का चरणकमल से स्पर्श होने पर) जाग उठती है। श्रीलालजी का अपने प्रति अति स्नेह देख उत्साह से भर उठती हैं और श्री श्याम सुंदर को हृदय से लगा अतिसुख प्रदान करती हैं । [2]

