ता व्रज के आवरण सुनि, गोपी गाय अरु ग्वाल।
तिन हूं ते बिहरत दुरहुँ, रसिकन के प्रतिपाल॥
-श्री बिहारिन देव, श्री बिहारी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (664)
जहां ब्रज में गोपी, गाय एवं ग्वाल इत्यादि का प्रवेश है, वहीं निज महल नित्य विहार रस में इन सब का प्रवेश नहीं जहां रसिक सहचरी ही केवल श्यामा श्याम को लाड़ लड़ाती है।

