फागुन लाग्यौ सखी जब तें - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

फागुन लाग्यौ सखी जब तें - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

(सवैया)
फागुन लाग्यौ सखी जब तें, तब ते ब्रजमण्डल धूम मच्यौ है। [1]
नारी नवेली बचै नहि एक, बिसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है॥ [2]
साँझ सकारे वही रसखानि, सुरंग गुलाल लै खेल रच्यौ है। [3]
को सजनी निलजी न भई ,अब कौन भटू जिहि मान बच्यौ है॥ [4]

- श्री रसखान, रसखान रत्नावली

जब से फाल्गुन का आनंदमय महीना आरंभ हुआ है, हे सखी! तब से पूरे ब्रजमंडल में उल्लास और उमंग की लहर दौड़ गई है। [1]

ब्रज की कोई नवयुवती अब शेष नहीं रही, सब प्रेमरस के रंग में रंग चुकी हैं। [2]

रस की ख़ान श्री श्यामसुंदर सुबह से लेकर साँझ तक रस में निमग्न होकर, गुलाल और रंगों की बौछारों से होली का अनुपम उत्सव रच रहे हैं। [3]

अब कौन-सी सजनी ऐसी होगी जिसने अपनी लाज संभाल रखी हो? सभी ने अपनी मान-लाज त्याग दी और श्यामसुंदर के साथ होली के रंगों में सराबोर हो गईं। [4]