श्रीबिहारीबिहारिन की री मोपै यह छबि बरनी न जाइ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी

श्रीबिहारीबिहारिन की री मोपै यह छबि बरनी न जाइ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी

(मूलताल)
श्रीबिहारीबिहारिन की री मोपै यह छबि बरनी न जाइ ।
कुंजमहल में होरी खेलैं जाके अंग अंग रंग चुचाइ॥ [1]
तन मन मिले जिले मृदु रस में आनंद उर न समाइ ।
श्रीहरिदास ललित छवि निरखत सेवत नव नव भाई ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी

अरी सखी ! श्रीविहारी-विहारिणी की यह छवि मुझसे वर्णन करने में नहीं आती। दोनों श्रीवृन्दावन नव-निकुंज-मंदिर में परस्पर होली खेल रहे हैं। इनके अंग-अंग से रंग बरस रहा है। [1]

तन से तन और मन से मन मिले हुए हैं। दोनों प्रेम-रस में निमग्न हो रहे है-आनंद हृदय में समा नहीं पा रहा है। श्रीहरिदासीजी इस ललित छवि का अपने नयन-चषकों से निरंतर पान करती हुई इन्हें नई-नई रीति से लाड़ लड़ाया करती हैं । [2]