हमारी गौर वरनि सरकार ।
पिय चित चोरी भानु किशोरी, अति भोरी रिझवार। [1]
तनु दुति तप्त स्वर्ण दुति ते हूँ, अति उद्दीप्त निहार।
श्री श्रीअंग दिव्य सौरभ ते, सुरभित नन्दकुमार। [2]
श्री श्रीअंग मृदुलता लखि दउँ, कोटि मृदुल्ता वार।
कह 'कृपालु' श्री अंग अंग लखि, पिय सुधि देह बिसार॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, श्री राधा त्रयोदशी (1)
स्वामिनी श्री राधा जू गौर वर्ण वाली हैं। प्रियतम श्यामसुन्दर के चित्त को चुराने वाली वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही भोली भाली हैं। [1]
उनके शरीर की कान्ति तपाये हुए स्वर्ण से भी अधिक दीप्तिमती है। उनके श्रीअंग अंगों की दिव्य गन्ध से नन्दनन्दन भी सुगन्धित हो गये।[2]
श्री राधा के अंगों की कोमलता को देखकर करोड़ों कोमलताओं को भी न्यौछावर किया जा सकता है। श्री 'कृपालु जी' कहते हैं कि श्री राधा के प्रत्येक अंग को देखकर श्री कृष्ण भी आत्म विस्मृत हो जाते हैं। [3]

