मोहिन्यामपि नास्ति मेऽद्भुतमतिः का पार्वती - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.78)

मोहिन्यामपि नास्ति मेऽद्भुतमतिः का पार्वती - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.78)

मोहिन्यामपि नास्ति मेऽद्भुतमतिः का पार्वती कोर्वशी का वान्या वरवर्णिनी रतियुता यच्चेटिकांगच्छटाम्। 
एकामप्यनुपश्यतो हृदि महासम्मोहनश्यामल। स्वान्तात्यन्तविमोहिनी स्फुरतु में वृन्दावनाधीश्वरी।। 
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.78)

जिनकी दासी की एक बार अंग छटा को देखकर पार्वती, उर्वशी तथा और किसी रतिमती सुन्दरी की तो बात ही दूर- स्वयं मोहिनी में भी मेरी बुद्धि आश्चर्य नहीं मानती । महा सम्मोहन श्रीश्यामसुन्दर के मन को भी मोहित करने वाली वह श्रीवृन्दावनाधीश्वरी (श्रीराधा) मेरे हृदय में स्फुरति हों।।