लालन तेरे ही आए आजु सुहावनी राति - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी

लालन तेरे ही आए आजु सुहावनी राति - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी

(राग विहागरो)
लालन तेरे ही आए आजु सुहावनी राति। 
तन मन फूलि अति अंग न समात । 
निकुंज में करत वधाई।। [1] 
कोक कला अति निपुण नागरी 
रूप देखत मो मन भाए। 
गिरधर पिय रसवस कीने
'कृष्णदास' दुलाराए ।। [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी

श्री कृष्णदास श्रीकृष्ण से कहते हैं: हे लालन! आज तुम्हारी सुहागरात है । श्री राधिका आज अति प्रसन्न होकर आपकी प्रतीक्षा एवं गुणगान कर रही हैं, निकुंज में बधाई गान चल रहा है । [1]

श्री राधिका नागरी समस्त कोक कलाओं में अति निपुण हैं, उनका रूप देखते ही सब को उसी क्षण संतुष्टि मिल जाती है । श्री कृष्णदास कहते हैं कि उनकी स्वामिनी श्री राधा ने अपने प्रियतम श्याम सुंदर को प्रत्येक क्षण अपने रस वश [आधीन] किया हुआ है । [2]