हरिवंशी हरिदासी जहां, व्यास आस करि वास।
रसिक त्रिवेणी विपिन में, नित्य विहार उपास॥
- श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (41)
जहाँ रसिक-त्रिवेणी—अर्थात् मुरली-अवतार श्री हित हरिवंश, ललिता-अवतार स्वामी श्री हरिदास और विशाखा-अवतार श्री हरिराम व्यास जी—ने अखण्ड वास कर नित्य-विहार-उपासना को प्रकाशित किया, ऐसे श्री वृन्दावन में वास करने की आशा रखनी चाहिए।
रसिक त्रिवेणी विपिन में, नित्य विहार उपास॥
- श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (41)
जहाँ रसिक-त्रिवेणी—अर्थात् मुरली-अवतार श्री हित हरिवंश, ललिता-अवतार स्वामी श्री हरिदास और विशाखा-अवतार श्री हरिराम व्यास जी—ने अखण्ड वास कर नित्य-विहार-उपासना को प्रकाशित किया, ऐसे श्री वृन्दावन में वास करने की आशा रखनी चाहिए।

