(राग सारंग)
हौं निज सखियनि की बलिहारी ।
जुगल-प्रीति अरु रूप जिनहिं कै, जीवन यहै सुधा री ।। [1]
नैननिं मग ह्वै पान करत दिन, तिहिं रस में रहैं लीन ।
सहि न सकत पल पलकनि अंतर, जैसैं जल में मीन ।। [2]
छिन-छिन नवल प्रिया सुख चाहत, और न मन कछु भावत ।
'हित ध्रुव' जिहिं विधि रूचि प्यारी मन, तिहिं-तिहिं भाँति लड़ावत ।। [3]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (34)
श्री ध्रुवदास जी कहते है कि मैं नित्य विहारिणी श्री प्रिया की निज सहचरियों की बलिहारी जाता हूँ, जिनका आस्वादनीय जीवन अमृत है - लाड़िली-लाल युगल के प्रति सहज प्रीति एवं अहर्निश उनका रूप-दर्शन । [1]
वे अपने नेत्र-मार्ग से युगल के रूप-रस का निरन्तर पान करती हुईं उसी रस में सदैव लीन रही आती हैं | ये रूपानुरागी सखियाँ रूप-दर्शन में एक पलक का भी अन्तराय सहन नहीं कर सकती, जैसे मछली जल का किंचित भी वियोग नहीं सह सकती। [2]
ये प्रतिक्षण नवल किशोरी प्रिया का ही सुख चाहती रहती हैं। उनके मन को प्रिया-रूप दर्शन के अतिरिक्त अन्य कुछ सुहाता ही नहीं | ये सखियाँ प्रिया के मन की जब और जैसी रुचि होती है, उसी भाँति उनको लाड़-लड़ाती रहती हैं । [3]
हौं निज सखियनि की बलिहारी ।
जुगल-प्रीति अरु रूप जिनहिं कै, जीवन यहै सुधा री ।। [1]
नैननिं मग ह्वै पान करत दिन, तिहिं रस में रहैं लीन ।
सहि न सकत पल पलकनि अंतर, जैसैं जल में मीन ।। [2]
छिन-छिन नवल प्रिया सुख चाहत, और न मन कछु भावत ।
'हित ध्रुव' जिहिं विधि रूचि प्यारी मन, तिहिं-तिहिं भाँति लड़ावत ।। [3]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (34)
श्री ध्रुवदास जी कहते है कि मैं नित्य विहारिणी श्री प्रिया की निज सहचरियों की बलिहारी जाता हूँ, जिनका आस्वादनीय जीवन अमृत है - लाड़िली-लाल युगल के प्रति सहज प्रीति एवं अहर्निश उनका रूप-दर्शन । [1]
वे अपने नेत्र-मार्ग से युगल के रूप-रस का निरन्तर पान करती हुईं उसी रस में सदैव लीन रही आती हैं | ये रूपानुरागी सखियाँ रूप-दर्शन में एक पलक का भी अन्तराय सहन नहीं कर सकती, जैसे मछली जल का किंचित भी वियोग नहीं सह सकती। [2]
ये प्रतिक्षण नवल किशोरी प्रिया का ही सुख चाहती रहती हैं। उनके मन को प्रिया-रूप दर्शन के अतिरिक्त अन्य कुछ सुहाता ही नहीं | ये सखियाँ प्रिया के मन की जब और जैसी रुचि होती है, उसी भाँति उनको लाड़-लड़ाती रहती हैं । [3]

