स्वमुखान्मन्मुखे देवि कदा - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (93)

स्वमुखान्मन्मुखे देवि कदा - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (93)

स्वमुखान्मन्मुखे देवि कदा ताम्बूलचर्वितम्।
स्नेहात्सर्वदिशो वीक्ष्य समये त्वं प्रदास्यसि? ।।

- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (93)

हे करुणामयि देवी श्री राधे ! चारों ओर देखते हुए अवसर पाकर कदा आप स्नेह पूर्वक अपने मुख का चर्वित पान मेरे मुख में ही प्रदान करोगी?