श्री यमुनाष्टकं - श्री वल्लभाचार्य

श्री यमुनाष्टकं - श्री वल्लभाचार्य

नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदा ।
मुरारि पद पंकज स्फ़ुरदमन्द रेणुत्कटाम ।।
तटस्थ नव कानन प्रकटमोद पुष्पाम्बुना ।
सुरासुरसुपूजित स्मरपितुः श्रियं बिभ्रतीम ।। [1]


मैं श्री यमुना जी को प्रणाम करता हूँ जो समस्त सिद्धि को प्रदान करने वाली हैं । श्री यमुना जी के छोर की रज श्री कृष्ण के चरण कमल के समान चमक रही है । श्री यमुनाजी के तट पर स्थित कुंजों के फूलों की सुगंध से यमुना जी का पानी भी सुगंधित है। समस्त विनम्र एवं चतुर गोपियां यमुना जी की भक्ति करती हैं । श्री यमुना जी श्री कृष्ण की सुंदरता अपने में समेटे हुए है ।

कलिन्द गिरि मस्तके पतदमन्दपूरोज्ज्वला ।
विलासगमनोल्लसत्प्रकटगण्ड्शैलोन्न्ता ।।
सघोषगति दन्तुरा समधिरूढदोलोत्तमा ।
मुकुन्दरतिवर्द्धिनी जयति पद्मबन्धोः सुता ।।[2]


भगवान नारायण के हृदय से प्रकट होते हुए, श्री यमुनाजी कालिंदी पर्वत के शिखर से जलप्रपात करती हुई दीप्तिमान हो रही हैं । वह क्रीड़ा करती हुई पुनः चट्टानी ढलानों पर उतरती हैं, जिसका जल गर्जना करता है क्योंकि वह प्रेम में उन्मत्त झूमती रहती हैं । सूर्य की पुत्री श्री यमुना जी की जय हो जो मुकुंद श्री कृष्ण के प्रति भक्तों के प्रेम को बढ़ाती हैं ।


भुवं भुवनपावनीमधिगतामनेकस्वनैः ।
प्रियाभिरिव सेवितां शुकमयूरहंसादिभिः ।।
तरंगभुजकंकण प्रकटमुक्तिकावालुका ।
नितन्बतटसुन्दरीं नमत कृष्ण्तुर्यप्रियाम ।।[3]


पृथ्वी को पावन करने हेतु ही श्री यमुना जी इस धरा पर प्रकट हुई हैं । जिस प्रकार गोपियाँ श्री कृष्ण की सेवा करती हैं वैसे ही मोर, तोते, हंस इत्यादि यमुना जी की सेवा में गुणगान करते हैं । श्री यमुना जी की लहरें उसकी भुजाएं हैं, रज ही उनकी मोतियों की चूड़ियाँ हैं, एवं उनके तट कमर है। ऐसी दिव्य एवं सुंदर श्री यमुना जी को मैं नमन करता हूँ जो श्री कृष्ण की अत्यंत प्रिय है ।


अनन्तगुण भूषिते शिवविरंचिदेवस्तुते ।
घनाघननिभे सदा ध्रुवपराशराभीष्टदे ।।
विशुद्ध मथुरातटे सकलगोपगोपीवृते ।
कृपाजलधिसंश्रिते मम मनः सुखं भावय ।।[4]

अनगिनत गुणों से अलंकृत श्री यमुना जी की स्तुति शिव, ब्रह्मा और अन्य देवताओं द्वारा की जाती है । श्री यमुना जी का रंग काले बादलों का रंग है और वह ध्रुव और पराशर की इच्छाओं को पूर्ण करती हैं । उसके किनारे में पवित्र मथुरा नगरी स्थित है । श्री यमुना जी गोपियों से घिरी हुई है। हे यमुनाजी, आपने कृपा के सागर श्री कृष्ण का आश्रय लिया है। कृपया मेरे हृदय में भक्ति का सुख प्रदान कीजिए ।

यया चरणपद्मजा मुररिपोः प्रियंभावुका ।
समागमनतो भवत्सकल सिद्धिदा सेवताम ।।
तया सदृशतामियात्कमलजा सपत्नीव यत ।
हरि प्रियकलिन्दया मनसि मे सदा स्थीयताम ।। [5]


जब गंगा आपके साथ विलीन हो गई, तो हे यमुनाजी, वह कृष्ण की प्रिय हो गईं और तभी गंगा उन सभी भक्ति शक्तियों को देने में सक्षम हो गईं, जो उनकी पूजा करते हैं। यदि कोई ऐसा है जो आपकी तुलना में थोड़ा हो तो वह आपकी सह-पत्नी श्री लक्ष्मी होगी। हे हरि प्रिया, तुम मेरे हृदय में नित्य वास करो।

नमोस्तु यमुने सदा तव चरित्र मत्यद्भुतं ।
न जातु यमयातना भवति ते पयः पानतः ।।
यमोपि भगिनी सुतान कथमुहन्ति दुष्टानपि ।
प्रियो भवति सेवनात्तव हरेर्यथा गोपिकाः ।। [6]


हे यमुने, मेरा आपको सदा प्रणाम है । आपका चरित्र सबसे अद्भुत है । जिसने भी आपका आचमन किया है उसको यमराज द्वारा यातना नहीं झेलनी पड़ती ।वह [यमराज] कैसे अपनी छोटी बहन द्वारा अपनाए हुए जन को नुक़सान पहुँचा सकता है भले ही वह पापी क्यों न हों ! जो आपकी सेवा करते हैं वह श्री कृष्ण द्वारा प्रिय बन ही जाते हैं जिस प्रकार गोपियाँ हरि प्रिया हो गयी हैं ।

ममास्तु तव सन्निधौ तनुनवत्वमेतावता ।
न दुर्लभतमा रतिर्मुररिपौ मुकुन्दप्रिये  ।।
अतोस्तु तव लालना सुरधुनी परं सुंगमात ।
त्तवैव भुवि कीर्तिता न तु कदापि पुष्टिस्थितैः ।। [7]


आपके निकट होने से [सानिध्य में] मेरा शरीर नव तनु दिव्य रूप को प्राप्त करे जिससे श्री कृष्ण को प्रेम करना कठिन नहीं होगा। यही कारण है कि मैं आपकी लाड़ लड़ाता हूं। इस जग में गंगाजी का गुणगान तब ही किया गया जब वह आपसे मिली एवं वैष्णव जन गंगा का इसलिए गुणगान करते हैं क्यूँकि वह आपसे मिली हैं ।

स्तुतिं तव करोति कः कमलजा सपत्नि प्रिये ।
हरेर्यदनुसेवया भवति सौख्यमामोक्षतः ।।
इयं तव कथाधिका सकल गोपिका संगम ।
स्मरश्रमजलाणुभिः सकल गात्रजैः संगमः ।। [8]


हे कृष्ण प्रिया श्री यमुनाजी, [लक्ष्मी की सह-पत्नी], आपकी प्रशंसा करने में कौन सक्षम है? यदि हरि संग यमुना जी की भक्ति करी जाए तो श्री लक्ष्मी देवी मुक्ति को प्रदान करती है । परंतु आपकी प्रशंसा एवं महत्व उससे कहीं अधिक है क्योंकि आपका पूरा शरीर श्री कृष्ण के स्वेद की बूंदों से लिप्त रहता है जब वह गोपियों संग विहार करते हैं ।

तवाष्टकमिदं मुदा पठति सूरसूते सदा ।
समस्तदुरितक्षयो भवति वै मुकुन्दे रतिः ।।
तया सकलसिद्धयो मुररिपुश्च सन्तुष्यति ।
स्वभाव विजयो भवेद्वदति वल्लभः श्री हरेः ।। [9]


हे सूर्य पुत्री, श्री यमुना देवी ! जो व्यक्ति इन आठ पदों द्वारा आपकी प्रशंसा करते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होकर श्री कृष्ण भक्ति को प्राप्त करते हैं । आपके माध्यम से कोई भी समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है एवं उन पर श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं। श्री हरि के प्रिय श्री वल्लभाचार्य कहते हैं कि आप अपने जनों के स्वभाव को बदल उन्हें भक्ति प्रदान करती हैं।