मुकुन्दानुरागेण रोमाञ्चिताङ्गै रहं व्याप्यमानां तनुस्वेद-विन्दुम् ।
महाहार्दवृष्ट्या कृपापाङ्गदृष्ट्या, समालोकयन्तीं कदा त्वां विचक्षे ।।
- जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (6)
श्री राधे ! तुम्हारे मन-प्राणों में आनन्दकन्द श्री कृष्ण का प्रगाढ अनुराग व्याप्त हैं । अतएव तुम्हारे श्री अंग सदा रोमाञ्च से विभूषित हैं और अंग-अंग सूक्ष्म स्वेद-बिंदुओं से सुशोभित होता है। तुम अपनी कृपा-कटाक्ष से परिपूर्ण दृष्टि द्वारा महान प्रेम की वर्षा करती हुई मेरी ओर देख रही हो; इस अवस्था में मुझे कब तुम्हारा दर्शन होगा ?
महाहार्दवृष्ट्या कृपापाङ्गदृष्ट्या, समालोकयन्तीं कदा त्वां विचक्षे ।।
- जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (6)
श्री राधे ! तुम्हारे मन-प्राणों में आनन्दकन्द श्री कृष्ण का प्रगाढ अनुराग व्याप्त हैं । अतएव तुम्हारे श्री अंग सदा रोमाञ्च से विभूषित हैं और अंग-अंग सूक्ष्म स्वेद-बिंदुओं से सुशोभित होता है। तुम अपनी कृपा-कटाक्ष से परिपूर्ण दृष्टि द्वारा महान प्रेम की वर्षा करती हुई मेरी ओर देख रही हो; इस अवस्था में मुझे कब तुम्हारा दर्शन होगा ?

