मानुस जनम पायौ बास वनराज जू कौ,
चतुर कहाय सीस साधुन कौं नायौ ना। [1]
धनी हू कहायौ धन दीयौ श्रीगुपालजू ने,
दान करिबे कौं कर ऊँचौ लै उठायौ ना॥ [2]
'लाल बलबीर' छाय रह्यौ जग जालन में,
ऐरे मतिहीन तोय नैक सोच आयौ ना। [3]
जोई काम आयौ सोई सोई बिसरायौ हाय,
बैठि के निकुंजन में राधा गुन गायौ ना॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, मनः शिक्षा (9)
यदि किसी ने इस बहुमूल्य मानव देह को प्राप्त किया है, तो उसे श्री वनराज (वृंदावन) में वास करना चाहिए। वह किस प्रकार का चतुर व्यक्ति है, यदि वह सभी संतों के आगे शीश नहीं झुकाता है? [1]
यदि धनी कहला कर गोपाल की सेवा में धन न लगाया, एवं दान करने के लिए अपने हाथों को आगे न बढ़ाया, तो वह किस प्रकार का धनी व्यक्ति है? [2]
हे मूर्ख (मतिहीन)! तू संसार के मिथ्या भोग विलास में सोया हुआ है, क्या तुझे अभी इतनी भी समझ नहीं है कि मानव जीवन की सार्थकता किसमें है? [3]
जो तेरी नित्य ही सहायता करती है, जो तुझको नित्य ही बिना किसी स्वार्थ के प्रेम करती हैं, ऐसी उदार स्वामिनी श्री राधा को तो तूने भूलाया हुआ है। धिक्कार है तेरे ऐसे जीवन को यदि ऐसी परम कृपालु स्वामिनी श्री राधा का निकुंजों में बैठ गुणगान न किया। [4]

