चलत्कुटिल कुन्तलं तिलक - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (185)

चलत्कुटिल कुन्तलं तिलक - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (185)

चलत्कुटिल कुन्तलं तिलक - शोभि-भालस्थलं, तिल-प्रसव नासिका - पुट-विराजि मुक्ता-फलम् ।
कलंकरहितामृतच्छवि समुज्ज्वलं राधिके, तवाति रति-पेशलं वदन-मण्डलं भावये ।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (185)

हे श्रीराधिके ! चंचल घुँघराली अलकों वाले, तिलक से शोभित भाल वाले, तिल के फूल के समान नासापुट में शोभित मोती वाले निष्कलंक चन्द्रमा से भी अत्यन्त उज्ज्वल और अतिशय प्रेम से सुन्दर दीखने वाले आपके मुखमण्डल की मैं भावना करती हूँ (ध्यान करती हूँ।) ।