(दोहा)
अहु राधे वृषभानु की, कुंवरी किसोरी बाल।
थोरी बै भौरीहि में, मोहे मोहन लाल॥
(पद) [इकताल, राग-विहागरौ]
जै जै श्री वृषभानु किसोरी।
राजत रसिक अंक अंकित सी, लसी स्याम संग गोरी॥ [1]
जै जै राधे रूप अगाधे, चितै चारु चित चोरी।
श्रीभट नटवर रूप सुंदर वर, मोहे तैं थोरी बै भोरी॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (81)
(दोहा)
हे वृषभानुनन्दिनी श्रीराधे! आपने अपनी किशोर अवस्था की सुकुमारता और भोलेपन से मोहनलाल को पूर्णतः मोहित कर लिया है। यहाँ प्रयुक्त 'भौरीहि' शब्द आपके उस निर्मल और सरल स्वभाव का परिचायक है जो सर्वथा छल-कपट से रहित है।
(पद)
हे वृषभानु नंदिनी आपकी बारम्बार जय हो। हे गोरी, आप रसिक शिरोमणि श्री लाल जी के अंक से अंकित सी अति सुशोभित लग रही हैं। [1]
हे अगाध सौंदर्य से परिपूर्ण श्री राधे, आपकी बारंबार जय हो। आपकी कटीली चितवन ने श्री श्याम सुन्दर के चित्त का अपहरण कर लिया है। निश्चित ही श्री सुंदर वर मोहन लाल को अल्प वयस [किशोर अवस्था] एवं भोलेपन से मोहित कर लिया है। [2]

