करि मन रसिकनी सौं सत्संग - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (72)

करि मन रसिकनी सौं सत्संग - श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (72)

(राग विहागरो)
करि मन रसिकनी सौं सत्संग ।
सुकृत सुहृदय भजन मैं भीजै उपजावैं निजु रंग ।। [1]
महा माधुरी ललित सलोचन निरखत वदन दुरंग ।
रूप बसंत इनके उर नित्य ही जुगल सरूप अभंग ।। [2]

- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (72)

अरे मन रसिकों का सत्य संग कर, जिनके सत्संग के प्रभाव से हृदय के समस्त सुकृत भजन में भींज कर रसिकों के हृदय का निज रंग [श्री राधा कृष्ण] हमारे हृदय में भी उपज आता है । [1]

जिनके [रसिकों के] संग के प्रभाव से साँवल गौर [श्री राधा कृष्ण] के बदन की अद्भुत महा माधुरी को यह नेत्र निरखने लगते हैं । श्री रूप सखी जी कहते हैं कि ऐसे रसिकों की बलिहारी है जिनके हृदय में नित्य निरंतर युगल स्वरूप बरसता रहता है । [2]