देह स्वाद छुटि जाहिं सब, कछु होइ छीन सरीर।
प्रेम रंग उर में बढ़े, बिहरै जमुना तीर॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (90)
इस देह के समस्त भौतिक स्वाद और आसक्तियाँ छूट जाएँ, चाहे यह शरीर कितना ही क्षीण (दुर्बल) क्यों न हो जाए। बस मेरे हृदय में भगवत्-प्रेम का रंग बढ़ता रहे और मैं सदा श्री यमुना जी के पावन तट पर विहार विचरण रहूँ।

