वास करें ब्रज में फिर, दूसरे देशन की कहूं राह ना जानी। [1]
प्रेम समाए रहयौ हिय में, बनि है कबहूंन विरागी न ज्ञानी॥ [2]
संग रहे रसिकों के सदा, अरु बात करे रस ही रस सानि। [3]
हमें औरन की परवाह नहीं, अपनी ठकुरानी श्री राधिका रानी॥ [4]
- ब्रज के सेवैयाँ
हम सदा नित्य ही ब्रज में वास करते हैं, हमें अन्य देशों और प्रदेशों का रास्ता भी जानना नहीं है। [1]
हमारे हृदय में नित्य ही प्रिया लाल का प्रेम समाया है, अतः हम न तो वैरागी बनना चाहते हैं और न ही ज्ञानी (बस हम तो प्रिया लाल के अनन्य प्रेमी हैं )। [2]
हम रसिकों की सभा में बैठते हैं, रस की ही चर्चा करते हैं और रस की ही मधुरता का पान करते हैं। [3]
हमें किसी और की परवाह नहीं, हमारी ठकुरानी केवल और केवल श्री राधिका रानी ही हैं। [4]
हमारे हृदय में नित्य ही प्रिया लाल का प्रेम समाया है, अतः हम न तो वैरागी बनना चाहते हैं और न ही ज्ञानी (बस हम तो प्रिया लाल के अनन्य प्रेमी हैं )। [2]
हम रसिकों की सभा में बैठते हैं, रस की ही चर्चा करते हैं और रस की ही मधुरता का पान करते हैं। [3]
हमें किसी और की परवाह नहीं, हमारी ठकुरानी केवल और केवल श्री राधिका रानी ही हैं। [4]

