न याति तृप्ति शतशोथ घुष्टं - श्री वृषभानुपुर शतक (2), श्री वंशी अली द्वारा रचित

न याति तृप्ति शतशोथ घुष्टं - श्री वृषभानुपुर शतक (2), श्री वंशी अली द्वारा रचित

न याति तृप्ति शतशोथ घुष्टं, पिबन् श्रुतिभ्यां मुहुरुन्नताभ्याम् ।
यन्नामबृन्दारकवृन्दवन्द्यं, सुधारसं वै प्रपिवन्ययाजः ॥2॥

- श्री वृषभानुपुर शतक (2), श्री वंशी अली द्वारा रचित

जिस वृषभानुपुरी [बरसाना] का नाम देव समूह द्वारा वन्दनीय है, जिस पुरी के नाम के सैकड़ों (अनन्त) बार उच्चारण को श्रीकृष्ण सावधानीपूर्वक अपने कानों से पुनः पुनः श्रवण करते हैं तथापि वे तृप्त नहीं होते हैं । निश्चित ही यह वह नगरी है जिसके द्वारा अज (ब्रह्माजी) ने (ब्रह्माचल के रूप में) सुधा रस का पान कर अपने को कृतार्थ किया है ।