(राग केदारौ)
प्यारी मेरो लालु रंगीलो रंगीली के बसि पर्यो।
अतिगंभीर सोभा गुन सागर पाछें डोलत रस भर्यो। [1]
निरखि निरखि चटकी सी लागी नैन नेह ढरनी ढर्यो।
‘केवल’ नित बिहारी बिहारिनि बाल सनेहु रिदहि धर्यो।[2]
- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (110)
हे सखी, मेरो रंगीलो लाल [कृष्ण] नित्य ही रंगीली ठकुरानी श्री राधा के वश में है । श्री राधा ठकुरानी अति अगाध शोभा एवं गुणों का समुद्र है, मेरा लाल उनके पीछे पीछे रस में विभोर होकर डोलता है । [1]
उनको निरख निरख मैं बलिहारी जा रही हूँ, मेरी अखियों से प्रेम के आंसुओं की धारा चल रही है । श्री केवल राम जी कहते हैं कि मेरा हृदय नित्य ही श्री बिहारी बिहारिनी [राधा कृष्ण] के प्रेम में डूब रहा है । [2]

