चैरोऽयं पतितोऽयमित्यतिवदन् - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.34)

चैरोऽयं पतितोऽयमित्यतिवदन् - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.34)

चैरोऽयं पतितोऽयमित्यतिवदन् सन्तर्जयंसताड़यन् वध्नन् सर्वजनोऽप्यनागसमिमं सर्वत्र चोद्वेजयेत्।
अन्तः क्लेशमतीव- दुःसहतरं प्राप्नोति नानाविधै- र्दुःखैर्द्यत एव चेत्तदपि में देहोऽस्तु वृन्दावने।।34।।

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.34)

कोई यदि मुझे ‘‘यह चोर है’’, ‘‘पतित है’’ इत्यादि वाक्यों से कठोर भर्त्सना करे, तर्ज्जना गर्ज्जनपूर्वक अच्छी तरह ताड़ना करे, बाँध दे, सब लोग निरपराधी मुझको सर्वत्र उद्विग्न करें अथवा यदि मुझको अतीव असह्य मनःपीड़ा ही प्राप्त हो, किंवा अनेक प्रकार के दुखों के द्वारा उत्पीड़ित कभी होऊँ, फिर भी मेरी यह शरीर तो इसी श्रीवृन्दावन में ही पात हो- यही मेरी प्रार्थना है।